शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012

तुम मर नहीं सकती ....

दिल्ली में बलात्कार नाम की एक घिनौनी कायरता की शिकार हुई और सम्पूर्ण पित्रसतात्मक मानसिकता में कैद समाज को झझकोर देने वाली, मेरी जुझारू दोस्त के संघर्ष के पक्ष में खड़ी ये कविता.

सब कहते हैं कि तुम मर गयी 
दम तोड़ दिया तुमने 
तुम बच भी जाती तो एक जिन्दा लाश बन कर जीती 
संसद में “महिला “स्वराज” की एक प्रतिनिधि ने कहा था.
और तुमने पाया था कि एक महिला भी पुरुष हो सकती है.

जब तुम लड़ रही थी उस सरहद पर 
जहाँ मर्द और औरत के बीच दिवार खड़ी है.
और औरत की आज़ादी उसकी नींव में गड़ी है
तब देश की सब औरतों ने पसारे थे पंख 
निकाले थे पाँव, चीख कर चिल्लाईं थी.
कि हमें ये दिवार ढहानी है
और दीवारों की ओर दौड कर टकरा गईं थी
उलझ गईं थी उस दिल्ली से जो पुरुष है

जब तुम लड़ रही थी,
किसी दुर्गा, काली, चंडी की तरह नहीं,
बल्कि खुद की तरह
तब घर से ले कर बाहर तक लहराई थी
वो कलाईयाँ, मुट्ठियाँ बन कर
जो 
तब से पहले महज़ चूडियाँ खनकाती थी

सारे फांसी के फंदे चटक कर गिरने वाले थे
सारे पिंजरे टूटने वाले थे
और वो परछाइयाँ जल कर भष्म होने वाली थीं
जिनमे आधी आबादी कैद है
कि तुमने शरीर का चोला उतर दिया
आवाज़ बन गयी,
शरीर की बेड़ियाँ काट कर रूह हो गयी तुम
नदी की तरह
हवा की तरह
आग की तरह
अब लड़ोगी तुम, शरीर की बंदिशों से आजाद हो कर
मैं जानता हूँ

मैं जानता हूँ कि वो मर नहीं सकती
जो आधी आबादी के पंख में धार कर सकती हो
पाँव की बेड़ियों पर हथौड़े से वार कर सकती हो
हर पल सांस की तरह मौत देने वाले
फांसी के फंदे को तोड़ कर गिरा सकती हो
वो मर नहीं सकती

मैं जानता हूँ
तुम एक शरीर छोड़ कर आधी आबादी हो गयी हो
तुम इस लड़ाई के अंतिम क्षण तक लड़ोगी
मैं जानता हूँ
तुम कहीं नहीं गयी हो
मैं जानता हूँ
तुम उन सब में जिन्दा हो
जो जिंदगी को बराबरी का मतलब देना चाहते है
मैं जानता हूँ
तुम मर नहीं सकती

तुम्हारे संघर्ष से प्रेरणा लेता और तुम्हे सलाम करता तुम्हारा दोस्त-अनुराग अनंत


http://www.jagran.com/news/national-timeline-of-delhi-gangrape-9989114.html

रविवार, दिसंबर 23, 2012

"वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

सागर की अतल गहराई से
आती है स्कूल की प्रार्थना की आवाज़
छुट्टी की घंटी की टन-टन-टन....
किसी कटी पतंग के पीछे भागते बच्चों का शोर
कच्चे घरौंदों की खुशबु
और बहुत कुछ
जिनका नाम लेना साइनाइड चाट लेने जैसा है

मैं सागर हूँ
और अतल गहराई, वो यादें
जिनमे याद करने लायक कुछ भी नहीं
सिवाय उस पंक्ति के....
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

सागर और गहराई के बीच
खड़ी है माँ
और उसकी आँखें
इन सब के ऊपर छाई है मेरी बेकारी
और वो पंक्ति
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

माँ के हाथों की बनाई रोटी
एक कुत्ता छीन ले गया है
वही कुत्ता जिसने मुझे
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....
गाते सुना और काट लिया था

घर अब घर नहीं लगता
वो फंसी का तख्ता लगता है
जहाँ भगत सिंह नाम के किसी आदमी को फांसी हुई थी
या फिर हरे खेत का वो कोना लगता है
जहाँ पाश को गोली मारी गयी थी
मैं खूब चाहता हूँ कि
वो मेरे बचपन के खेल का मैंदान लगे
जहाँ मैंने सीखा था कि कैसे सीखना चाहिए
वो कोचिंग की बोरिंग क्लास लगे
जहाँ मैंने अनुभव किया था कि लड़कियों की आँखों में जादू होता है
और न्यूटन और पाईथागोरस पागल थे
पर बहुत चाहने के बाद भी घर मुझे वो जंगल लगता है
जहाँ एक सागर
अतल गहराई में समा जाना चाहता है
खो जाना चाहता है
किसी रंग में जिसका नाम अभी खोजा जाना बाकी है

मेरी माँ का बेटा
कहीं खो गया है
दीवारों के नारों ने
अखबारी कतरनों ने
और जंगल से आने वाली
नदियों, पहाड़ों और आदमियों की आवाज़ों ने
न जाने उसे कहाँ ले जा कर छोड़ा है
मेरी माँ उसकी आवाज़ नहीं सुन पाती
सुन पाती है तो बस वो पक्तियां

"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें..... की सतत अनुगूंज

वो मेरी ओर देखती है
अब मैं क्या बोलूं
वो जाने और उसका बेटा जाने
मैं तो सागर हूँ
जो अपनी अतल गहराई में खोया हुआ है
साइनाइड चाट के सोया हुआ है

तुम्हारा- अनंत

मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

मेरे भीतर का मर्द मार दिया जाए..............

आज बहुत शर्मिंदगी हो रही है हर उस चीज से, जो मुझसे और सबसे बिना कुछ कहे ही कह देती हैं कि मैं मर्द हूँ. मैं आज हर उस चीज को खुद से अलग कर देना चाहता हूँ जो मुझे मर्द बनाती है. क्योंकि मर्द होना जानवर होना होता है. कुछ ऐसा ही लगने लगा है मुझे, जब से दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में उस लड़की का  बलात्कार हुआ है जिसका नाम मैं नहीं जानता हूँ.पर मैं इतना जनता हूँ कि वो एक लड़की थी, एक इंसान थी, मैं ये नहीं कहूँगा कि वो एक बहन थी, एक बेटी थी, एक ये थी, एक वो थी, गंगा की तरह पवित्र थी, धरती की तरह गरिमामयी थी, और ऐसे ही अनाप-सनाप के उपमाएं मैं नहीं गढूंगा, क्योंकि मैं जान गया हूँ कि ये मर्दों की और उनकी व्यवस्था की साजिश है. एक ऐसा जाल जिसमे एक लड़की फंस कर अपना वजूद खो देती है. 

मेरे लिए वो एक लड़की थी, एक लड़की, जिसका अपना वजूद था जो हमारे आपके और किसी और के बताये हुए परिभाषिक सांचों से बहार अपना रूप-रंग, आकार, गढ़ने को अमादा थी और पूरी ताकत से लैस भी. पर एक कायरता का शिकार हो गयी. जिसे हमारा सभ्य-समाज सामूहिक बलात्कार, गैंगरेप जैसे मर्यादित नामों से जानता है. मर्यादित इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि  ऐसे ही कई प्रतापी काम करके हमारे नेता संसद के मंदिर में पहुंचे है और संविधान, क़ानून और व्यवस्था का घंटा बजा रहे  है.  

सच में आज मैं दिल से चाहता हूँ कि मुझे और इस पूरी पित्रसतात्मक व्यवस्ता को थोडा-थोडा ज़हर पिलाया जाये, थोड़ी-थोड़ी फाँसी दी जाये. थोडा-थोडा जलाया जाये, मैं चाहता हूँ कि हम सब का थोडा थोडा बलात्कार किया जाए. इस बार हमें बच कर कतई निकलने न दिया जाये. 

मैं चाहता हूँ कि वो लड़की जो पीलीभीत की रहने वाली है, जो रविवार 9:30 बजे रात से पहले ये सोचती थी कि दुनिया सुन्दर है, जिसने पढ़ रखा था कि जब किसी अबला की इज्ज़त  पर बन आती है तो भगवान कृष्ण उसकी इज्ज़त बचने के लिए आ जाते है. जो आकाश छू लेना चाहती थी. जो दिन में कम से कम 24 बार शादी के सलोने सपने देखा करती थी. जिसने G.K.  की किताब  से बचपन में ही, दिल्ली देश की राजधानी है और यहाँ पर कानून बनाये जाते है यहाँ पर संसद है, देश भर के चुने हुए अच्छे लोग (नेता) यहाँ पहुँचते है, ऐसे ही कई लघु उत्तरीय प्रश्न  रट लिए थे.

मैं चाहता हूँ कि  वो लड़की जो अभी दिल्ली के शफदरगंज  अस्पताल में वेंटिलेटर पर लेती है और किसी भी पल कोमा में जा सकती है. वो लड़की जिसने जिंदगी का असली चेहरा देख लिया है और अब कतई नहीं कह पायेगी कि दुनिया सुन्दर है. वो लड़की जिसका विश्वास और इज्ज़त लूटी गयी और कृष्ण नहीं आये और उसने कृष्ण को गीता में जितने श्लोक है उतनी गलियां और उलहने दिए होंगे  

मैं चाहता हूँ कि वो लड़की जिसके जहन में अब कोई सपना नहीं पनपेगा. जो अपने साथ घटी हकीकत से कभी बहार नहीं निकल पायेगी. वो लड़की जिसने बचपन में G.K. की किताब  से रटे सारे लघु उत्तरीय प्रश्न भुला दिए होंगे और दिमाग में लिख लिया होगा कि दिल्ली में सिर्फ दरिंदे बसते है. 

मैं चाहता हूँ वो लड़की दुर्गा, चंडी, काली, फूलनदेवी, या ऐसा ही कुछ बन कर सारे देश की औरतों की  सेना ले कर आये और  मेरे भीतर के और इस समाज के भीतर के मर्द को मार दे. 

सच कहता हूँ मैं आज उस लड़की के हांथो मर जाना चाहता हूँ. क्योंकि उसे अधिकार है कि वो हमें एक लाइन से खड़ा  करके गोली मार दे या फिर लाल किले के बुर्ज पर हमारे शीष  काट कर टांग दे. क्योंकि हम इस समाज के हिस्से है और चुप्पे भी. चुप्पी की सजा मौत होती है.  


मेरे भीतर का मर्द मार दिया जाए..............

तुम दिल्ली के किसी अस्पताल में
वेंटिलेटर पर पड़ी हो
किसी भी पल कोमा में चली जाओगी

ऐसा कहा है अखबार ने,
टीवी पर तुम जैसी एक लड़की ने
रेडियो भी कह रहा था, यही बात

सुनो! मुझे तुमसे शिकायत है
हाँ! सीता
द्रोपदी 
अहिल्या
मलाला यूसुफजई
सोनी सोरी
मनोरमा मणिपुरी 
जो भी तुम्हारा नाम हो 
मुझे तुमसे शिकायत है !

तुम वापस क्यों नहीं आती
दुर्गा, चंडी, काली
उदा पासी
फूलन देवी
या ऐसी ही कुछ बन कर

मैं चाहता हूँ 
कि मेरे भीतर के मर्द को तुम मार दो ! 
वो भी था
दिल्ली की उस चलती हुई बस में 
जहाँ तुम्हारे एहसासों के परिंदों के पर काट दिए गए 
और उनके  मरे हुए चेहरों पर लिख दिया गया 

दुनिया दरिंदों की है! 

मैं तुम्हें बुला रहा हूँ 
तुम आना जरूर आना 
और मेरे भीतर के मर्द को 
ज़हर देना 
जला देना 
फाँसी देना 
बलात्कार कर देना 
या फिर ऐसा ही कुछ जो तुम्हारे मन में आए

पर तुम आना जरूर 
क्योंकि मैं चाहता हूँ 
कि मेरे भीतर के मर्द को मार दिया जाए

वेंटिलेटर पर पड़ी मेरी दोस्त---तुम्हारा अनंत 

खबर की  लिंक


शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012

उसकी आँखों के मकतब मे......


उसकी आँखों के मकतब मे  मोहब्बत पढ़ के आया हूँ,
मैं कतरा हूँ दरिया का, सहरा से लड़ के आया हूँ,
काटा था पर सैयाद ने कि उड़ न सकूँगा ,
जो उसने बुलया तो मैं उड़ के आया हूँ,
एक डायरी मे रख कर, उसने मुझे गुलाब कर दिया,
खोला जो किसी ने तो फूल से झड़ के आया हूँ,
मैं एक सूखी  हुई पंखुरी हूँ, तो क्या हुआ, मुझे होंठों से लगा लो,
कसम खुदा की मैं खुद को मोहब्बत से मढ़ के आया हूँ
एक हरा -भरा दरख्त था मैं किसी जमाने मे,
किसी ने मेरी छाँव यूं खींची कि  उखाड़ के आया हूँ,
यूं तो कोई गरज न थी मुझे तुम्हारी महफिल मे आने की,
पर क्या करू मैं तुम्हारी मोहब्बत मे पड़ के आया हूँ ,

तुमहरा--अनंत 

एक उजड़ा शहर .....


उसका असर कुछ इस कदर हो गया है,
कि असर का असर भी बेअसर हो गया है,
इस लुटे हुए दिल को कोई दिल क्यों कहेगा,
ये दिल तो एक उजड़ा शहर हो गया है,
राहें और मंजिल जिसकी दोनों ही गुम हैं,
वो मदमस्त राही बेफ़िकर हो गया है,
जो समंदर की सोहबत में रह करके लौटा,
वो थोड़ा सा साहिल, थोड़ा लहर हो गया है,
ये बद्हवास ख्वाबों की दौड़ थमती नहीं क्यों,
आज आदमी खुद एक सफ़र हो गया है,
तुमने लालच से उसे ऐसा मैला किया है ,
कि जो पानी था अमृत, वो जहर हो गया है,
तुम्हारा--अनंत

इंसानियत का नशा.......


मैं रात-ओ-दिन एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ,
मैं अपने लहू से अपनी गजल गढ़ता हूँ,
वो बेवफा हो गया तो क्या हुआ ''अनंत''
मैं उसके खातिर अब तलक दिल मे वफा रखता हूँ,
वो मिलता है तो मुँह पर दुआ और दिल मे मैल होती है,
मैं जब भी मिलता है ,दिल आईने सा सफा रखता हूँ,
शायद यही वजह है जो इस घाटे के दौर मे भी,
मैं यारों की दौलत और मोहब्बत का नफ़ा रखता हूँ,
जला है जब से नशेमान मेरा मैं नशे मे हूँ ,
अब हर वक़्त बस मैं इंसानियत का नशा रखता हूँ
तुम्हारा---अनंत

शनिवार, सितंबर 29, 2012

झोंको से झुक जाते हैं.....गज़ल

इस भीड़ में चल चल कर लोग थक जाते है,
उन्हें पता भी नहीं चलता और वो बिक जाते हैं,
झुकने का चलन कुछ इस कदर से चल निकला है यार,
कि जो तूफानों में नहीं झुकते थे, अब झोंको में झुक जाते हैं,
कोई मजलूम कुछ बोले, तो उन्हें बदतमीज़ी  लगती है,
वो दौलत के नशे में, जो मुंह में आए बक जाते हैं,
संभल कर चलते हैं, लोग राह-ए-खार पर ''अनंत''
पर जब पैरों तले गुल पड़ते है तो बहक जाते हैं,
डर लगता हैं हमें अय्यारों की इस बस्ती में,
यहाँ खुली बाहों के चमन, कफ़स में बदल जाते हैं,
कुर्सी के आशिकों ने तुर्फ़ा  तरीके तलाशे खूब,
कभी हिन्दू के घर जलते है, कभी मुस्लिम के घर जल जाते हैं,
कोई मिले यहाँ जो  समझदार-ओ-वफादार मुझको,
मैं पूछूं, जो बरसते हैं समन्दरों पर, कैसे रेगिस्तान पर चुक जाते हैं,

तुम्हारा--अनंत 

शुक्रवार, सितंबर 28, 2012

मैं इंसान हूँ,......ग़ज़ल

ये आँखों का अश्क नहीं पागल,
ये मेरे दिल का दर्द बहता है,
बताते है ये अश्क, कि मैं इंसान हूँ,
वरना कहाँ कोई पत्थर कभी रोता है,
मशीन बना दिया आदमी की भूंख ने उसे,
वो देखो आदमी-आदमी का बोझ ढोता है,
क्यों बेघर है राजगीर, जुलाहा क्यों नंगा है,
आखिर क्यों किसान भूखा पेट सोता है,
हंसता है क्यों ये ऊंचा महल झोपड़ी पर,
आखिर झोपडी का भी अपना कोई वज़ूद होता है,
चल साथ मेरे साथी, हम मिल कर लड़ेंगे,
क्यों बेसबब अश्कों से, अपना दामन भिगोता है,

तुम्हारा- अनन्त 

गुरुवार, सितंबर 20, 2012

भरम का चराग ................

बहते हुए पानी में भरम का चराग था. 
बेदाग़ समझ बैठा जिसे, उसके दामन में दाग था,
ज़िन्दगी अपनी सौंपी थी, जिसे मोहब्बत के नाम पर,
जालिम था, वो जुल्मी था, बड़ा ज़ल्लाद था,
हम जिसे इश्क समझ कर फ़साना बुनते रहे, 
वो तो उसके  लिए बस एक अदना  मजाक था,
मेरा दिल कुछ भी नहीं था उसके  लिए,
राह पर पड़ा बस  इक ढेर-ए-ख़ाक था,
आँखों से बह कर सूख गया जो गालों की रेत पर,
वो कोई कतरा-ए- अश्क नहीं था, मेरा ख्वाब था,
मिल कर उससे वो लज्जत न मिली, मिलने की,
ये दिल बेवजह उससे  मिलने को बेताब था,
जला दिया जिसने मुझे और मेरे अरमानों को,
वो हुस्न का एक बहता हुआ दरिया-ए-तेज़ाब था,

तुम्हारा--अनंत 


बुधवार, सितंबर 19, 2012

खुद को लूट जाता हूँ......गज़ल

मैं गहरे से गहरे समंदर की गहराई नाप लेता हूँ,
पर न जाने क्यों तेरी आँखों में अक्सर डूब जाता हूँ,
तेरे संग  मुझे हर सांस रंगीन लगती है,
तेरे बिना मैं सांस लेने में भी ऊब जाता हूँ,
मिलता हूँ जब तुझसे जिंदा हो जाता हूँ,
तेरे बिछड़ते ही लावारिश लाश सा छूट जाता हूँ,
मुझे आहिस्ते से छू, यूं धक्का न मार यार, 
जरा से धक्के से मैं कांच सा टूट जाता हूँ,
दर्द बढ़ जाता है, जब-जब रोने को दिल करता है,
बन कर ग़ज़ल कागज़ पर फूट जाता हूँ,
निकलता हूँ मैं तनहा रातों में वारदात करने को,
डालता हूँ खुद के घर डाका, खुद को लूट जाता हूँ,
मिलती नहीं है छांव किसी ठांव अब ''अनंत''
छांव के घर भी जाता हूँ, तो धुप  पाता हूँ,

तुम्हारा--अनन्त 

बुधवार, अगस्त 08, 2012

तुम बहो झरने की तरह

एक भंवर है या धुआं या जाल,
न जाने क्या है ये,
जहाँ मैं हूँ और बस तुम्हारी याद है,

ख्वाईसें ज़मीदोज़,
हसरतें  लापता,
चाहतों की दरगाह सूनी,
और मैं तन्हा,
तुम्हारी यादों के साथ हूँ,

मुझे तन्हा रहने दो,
कम से कम  तबतक,
जबतक तुम खुद न तोड़ दो,
इस तन्हाई का भंवर,
धुँआ या जाल,
जो कुछ भी है ये,

तुम बहो झरने की तरह मेरी नसों में,
और मैं नदी बन जा मिलूं  सुकून के सागर में,

तुम्हारा--अनंत


गुरुवार, मई 10, 2012

परछाई..........

लाल  कैनवास  पर  ,
सबसे  ऊपर  एक छड़,
नापने के लिए लगी हुई है,
उसके नीचे औंधे मुंह लेटी औरत,
कुल जमा कद 5 फुट 2 इंच,

महज एक जिस्म,
जिस्म का तिलस्म,

हाँथ में एक काँच का गिलास,
गिलास में समुद्र और आकाश,
बेतरतीब बिखरी हुई प्यास,

परछाईं  के एक डंडे  से भी फोड़ा जा सकता है गिलास ,
और बह सकती  है एक छाया,
एक अदद प्यास,
उसी औरत की,
जो औंधे मुंह लेटी है,
नापने वाली छड़ के नीचे,
नपते  हुए,

शांत, सिसकती, पिघलती,
प्यास में लिथड़ी हुई परछाई में,
मैंने तड़पती हुई मछलियाँ देखीं है

तुम्हारा-- अनंत

सोमवार, अप्रैल 23, 2012

लड़की!

लड़की! 
उडती हुई चिड़िया के पर गिन रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
वो भी उड़ सकेगी,

लड़की!
बहती हुई धार की चाल देख रही है,
उसे यकीन है,
कि  एक दिन,
वो भी बह सकेगी, 

लड़की!
धधकते हुए अल्फाज चुन रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
इन्हें वो भी कह सकेगी,

लड़की!
बंद कमरे में कुछ लिख रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
इन्हें सब के सामने  पढ़ सकेगी,

लड़की!
खुली आँखों से सपने देख रही है,
उसे यकीन है
कि एक दिन,
इन्हें वो भी जी सकेगी,  

तुम्हारा--अनंत  


रविवार, अप्रैल 22, 2012

एक मेमना कल मार दिया गया है,

एक मेमना कल मार दिया गया है,
डूबते सूरज को साक्षी करके,
शहर के आखरी छोर पर,
उसके कान में कहा गया,
कि तुम झूठ के जाल में,
फंसे हुए एक कीड़े हो,
इसलिए तुम्हे मर  जाना चाहिए,

बिना आंगन वाले घर के छत पर,
चढ़ कर चाँद ने सीढियों से नीचे झाँका,
दो जिस्म, एक मेमना और एक मोबाइल,
बरामद हुए थे,
रात के उस प्रहार,
जब सब सो रहे थे,
प्रेमपत्र पर लिखे गए,
बेमानी जज्बात की  तरह,

प्रेम के अचार को;
चाटा गया, चूसा गया,
और फिर फेंक दिया गया,
सीढियों  के नीचे,

मेमना एक जिस्म के साथ चला गया,
मोबाइल एक जिस्म के साथ,
चूसा और चटा हुआ;
प्रेम का अचार पड़ा रह गया,
सीढियों के नीचे,

गुलाबी एहसासों वाले प्रेम को;
नीली फिल्म बनते देर नहीं लगती,

देखा था जिसे कल चाँद ने,
आज सारी दुनिया देख रही है,
विस्वास की जलती चिता में,
आँखें सेंक रही है,

छोटे शहर के,
एक बड़े अस्पताल में,
एक छोटा सा, बड़ा काम कर दिया गया है,
एक मेमना कल मार दिया गया है,

तुम्हारा--अनंत 

गिरफ्त

चाय से चाय छान कर अलग कर दें,
तो काली चाय बचती है,
ठीक उसी तरह जैसे ;

भूख से भूख छान कर अलग कर देने पर,
काली भूख बचती है,

काली चाय में जितना दूध मिलाया जाता है,
काली चाय उतनी ही सफ़ेद हो जाती है,

काली भूख में जितनी रोटी  मिलाई  जाती है,
काली भूख उतनी ही सफ़ेद हो जाती है,

दूध का रंग सफ़ेद है,
रोटी का रंग सफ़ेद है,
अफ़सोस दोनों सफ़ेदी की गिरफ्त में है,

तुम्हारा--अनंत 

शनिवार, अप्रैल 21, 2012

सवालों के साथ मुठभेड़

रोटी की फिकर,
किसी टूटे हुए नल से,
टपकते हुए पानी की तरह होती है,
जो टप..टप...टप...की जगह,
रोटी...रोटी....रोटी करती है,

रोटी की फिकर वो सवाल है,
जो अध्यापक प्रश्नपत्र में दे तो देता है,
पर उत्तर स्वयं नहीं जानता,
सारी कक्षा के फेल हो जाने के बाद,
अध्यापक  खुद फेल हो जाता है,
और वो सवाल जिंदगी के जलते हुए तावे पर,
सेंक दिए जाते है,
उन्हें भुने हुए गोस्त की तरह पैर-पर-पैर चढ़ा कर,
बड़े किले के पीछे कुर्सी वाले खाते है,

सवाल की रीढ़ की हड्डी का एक सिरा ,
खिखिया कर हँसता है  
एक सिरा रोटिया  कर रोता है,

और एक नहीं कई लाश अपने पीठ पर ढोता है,
उन इंसानों की लाश,
जो आँखों को चौंधिया देने वाली चमक में,
अँधेरी गली के अंधे मोड़ पर,
मारे गए थे,
सवालों के साथ मुठभेड़ में,

जो सवाल बच गए हैं ,
किसी जिन्दा लाश के बगल में,
सर पर हाँथ रखे,
बैठे हुए, डूबे  हैं ,
रोटी की फिकर में,

तुम्हारा--अनंत 

सबसे लम्बी दूरी...

सबसे लम्बी दूरी तय करना  है,
एक लम्बी सुरंग,
जिसके एक सिरे पर दर्द है,
और दुसरे सिरे पर,
दर्द का हमशक्ल,

डर, गुस्सा, घृणा, आंसू, उम्मीद, आशा, झल्लाहट,
और बहुत सारे बेनाम-अनाम लोग,
उस लम्बी दूरी के बीच भटक रहे हैं,

समोसा की तरह तिकोना मुंह,
तीर की तरह शरीर,
नाव की तरह पाँव,
रोटी की तरह पेट,
ताड़  की ताड़ी सा पसीना,
बहाते  हुए चले जा रहे हैं,

सबसे लम्बी दूरी तय करना है,
पीठ से पेट के बीच की दूरी,
ख़ामोशी से शब्द के बीच की दूरी,
कल से आज के बीच की दूरी,
इंसान से इंसान के बीच की दूरी तय करना है,
सबसे लम्बी दूरी तय करना है..

तुम्हारा --अनंत 


दो बूँद रौशनी की....

कुत्ते ने नहीं गाया है बहुत दिनों से राग भैरवी
और गाय भी भूल गयी है
कैसे कटी थी, पिछली बार.

नई धुन में प्यार पोंका जायेगा,
सब तैयार हैं सिवाय उस बैल के,
और उस शेर के,
जो माटी और ईंट-सीमेंट के बने हैं,

अँधेरे की बोलत में मिनिरल वाटर नहीं है,
न ही है; कोल्डड्रिंक,
शराब भी नहीं है,
रौशनी है चाशनी में घुली हुई,
दो बूँद टपकाता है,
दो-दो बूँद,
सारा देश पोलियो ग्रस्त हो गया है,
दो बूँद रौशनी के पी कर, 

तुम्हारा--अनंत 

कफ़न.....

आशुतोष से साभार ......
लौंग के फूल की तरह, 
तोड़ कर अलग कर दिया जाता है कवि, 
और कविता चबा ली जाती है,
 मुंह महकाने  के लिए,

अलमारियों के जिन खांचो में किताबों के कंकाल पड़े हैं,
 उनमे नमक की अदृश्य बोतलें बहाई गयी है,

ख़ामोशी की ख़ाकी चादर उढ़ा कर ढांक दिया गया है, 
उस कातिल खंजर को;  कि जिससे कल बेवक्त, वक़्त का क़त्ल किया गया था,
और रोते हुए संगीत को ढोते हुए,
साज की जान निकल गयी थी प्यास से, 

कफ़न की जगह पहनाया गया था तिरंगा,
जिससे भाग कर छिप गया था बलिदान और संघर्ष का केसरिया रंग जंगलों में,

हरियाली को लकवा मर गया था 
वो किसी बड़े अस्पताल में भर्ती है,
अब उससे मिलने के लिए कार से जाना पड़ता है,
जिसके पास कार नहीं है वो हरियाली  से नहीं मिल सकता,

स्वाभिमान कल दो रुपये किलो बिक रहा था,
किसी ने नहीं ख़रीदा उसे,
अशोक के चक्र नीचे आ कर उसने जान दे दी,
अशोक के  चक्र को ताज़े-राते-हिंद-तउम्र-कैदे-बमशक्कत हुई है 
अब  तो  तिरंगे में महज उदास सफ़ेद रंग बचा है,
जो कफ़न है, 
जन-गण-के मन पर पड़ा हुआ,
कफ़न !

तुम्हारा--अनंत 

सोमवार, अप्रैल 02, 2012

मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,..........

कलाकार बड़ा ही अजीब होता है, उसे दर्द होता भी है और नहीं भी होता, उसे  ख़ुशी होती  भी है और नहीं  भी होती,  खुद के गम को गम नहीं समझ जाता उससे और दूसरों के गम से मूंह भी नहीं मोड़ा जाता, जिन लोगों को भी भगवान पर विश्वास है वो अक्सर ये कहते हुए पाए जाते है ''कलाकार को भगवान ने जाने कौन सी मिट्टी से बनाया है'' उन लोगों में एक मैं भी हूँ क्योंकि मैं भी कहीं न कहीं इश्वर जैसी किसी चीज पर विस्वास करता हूँ .......पर उसका रूप, और परिभाषा वैसी नहीं है जैसा ठग विद्वानों ने बताया है. खैर आज एक पन्ना मिला, पुरानी किताबों के बीच से बहुत पहले लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ शायद उस वक़्त जब मन ये निश्चय कर रहा था कि अब कलाकार ही बनना है, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े,,,,,,,,,,,, तो मिलिए उन पंक्तियों से........


                                                                            ( 1 )

काँपती  हवाओं की शाखाओं पर,
हमने आशियाना बना रखा है,
जोड़ कर तिनका-तिनका,
एक शहर सजा रखा है,
पर गर वक़त की सुनामी में,
 बह जाए सब कुछ,तो भी गम नहीं,
हम कलाकार हैं हमने दिल फौलाद बना रखा है,

                                                                          ( 2 )
अँधेरे में भी जो चमक जाते हैं,
गर्दिशों में हँसते हैं, मुस्कुराते हैं,
लाख गम हो सीने में उनके,
 पर कहाँ वो उस गम को दिखाते है,
बनाया है फौलादी मिट्टी से खुदा ने उनको,
वो कलाकार हैं बमुश्किल आंसू बहते है,


                                                                         ( 3 )
दिल की दिवार पर पड़ी एक दरार हूँ,
जिंदगी के साथ हुआ एक टूटा  करार हूँ,
ज़माने ने बनाई जो कालकोठरी जिम्मेदारियों की,
मैं उन कालकोठरियों से, मुजरिम फरार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

भीगा है  दिल आंसूओं से,
मैं उनकी चुभती बातों का शिकार हूँ,
डसती है जहरीली निगाहें अपनों की,
मैं उनकी नज़रों में, एक इंसान बेकार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

भूखे बच्चों के चेहरों पर,प्रश्न चिन्ह तैरते हैं.
बीबी के शाब्दिक नाखून मेरे ज़ख़्म उकेरते हैं,
माँ बिमारी में तड़प कर एडियाँ रगडती है,
बाप की बूढी आँखें अब मुझसे झगडती हैं,
हक़दार हूँ मैं तुम्हारी तालियों का,
पर उनका गुनाहगार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

मैं छोटे भाई बहनों को प्यार न दे सका,
उनकी बिखरती जिंदगी को संवार न सका,
लुट गया बचपन उनका बचपन में ही,
और मैं फस हुआ था गीत-ओ-गुंजन में ही,
कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है,
 मैं एक मजबूत घर की  कमज़ोर दीवार हूँ,
 मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

तुम्हारा---अनंत 

 
    

सोमवार, मार्च 26, 2012

भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो.....

भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,
ठीक निराला के कुकुरमुत्ता की तरह,
तुम उग आते हो वहां भी,
जहाँ संभावनाओं की संभावनाएं भी दम तोड़ देती है,
जहाँ आशाओं का हलक सूखने लगता है,
उम्मीद के जन्नांगों में पत्थर डाल दिए जाते है,
उत्साह के कोख में,
निराशा की नाजायज औलाद ठूंस दी जाती है,
जहाँ चरित्र का सूरज पिघल कर,
विस्की, रम और बियर हो जाता है,
जहाँ राष्ट्र का हीरो,
बन जाता है सेल्समैन,
और बेचता है कोंडोम से ले कर विस्वास तक,
सबकुछ.........
तुम वहां भी उग आते है,


किसी हारे हुए की आखरी हार से पहले,
किसी भूखे आदमी की आखरी आह! से पहले,
किसी ख़ामोशी के एकदम खामोश हो जाने से पहले,
तुम उग आते हो,
भगत सिंह तुम  बड़े बेहया हो,

कितनी बार चढ़ाया है तुम्हे फांसी पर,
बरसाई हैं लाठियाँ,
सुनाई है सज़ा,
जलाई है बस्तियां,
तुम्हारे अपनों की....
कितनी बार भड़काए गए  हैं,
दंगे,
तुम्हारे गाँव में,
कस्बों में,
शहरों में,
कितनी बार काटा गया है तुहारा अंगूठा,
चुना है तुमने ही,
शोषण के लिए,
कितनी बार अवसाद की अँधेरी कोठरी में,
की है तुमने आत्महत्या,

भगत सिंह न जाने कितनी बार,
न जाने कितने तरीकों से,
तोड़ा मरोड़ा गया है तुम्हे,
पर तुम उग आते हो,

किसी मजदूर के हांथों के ज़ख्म भरने से पहले,
किसी निर्दोष के  आंसू सूखने से पहले,
किसी जलती हुई झोपडी की राख़ बुझने से पहले,
किसी बेदम इंसान का लोकतंत्र पर से विस्वास उठने से पहले,
तुम उग आते हो,
भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,

बेहया लोग ख़तरनाक़ होते हैं,
हया इंसान हो डरपोक और दोगला बना देती है,
तुम्हारे सपने मरे नहीं है,
इसलिए तुम बेहया हो,
औए शायद इसीलिए ख़तरनाक़ भी,

सीलन वाली अलमारी पर,
सबसे किनारे रखी,
सबसे कम कीमत की,
सबसे रद्दी कॉपी पर,
तुम उग आये हो,

मजदूरों के कंकाल,
किसानों की लाश,
और जवानों के गुस्से पर,
लिखी गयी कविता,
में तुम उग आये हो,
भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,

भगत सिंह--तुम्हारा--अनंत 

शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012

जर्जर किले के पीछे....!!

शहर के एक छोर में
एक जर्जर किले के पीछे
बूढ़े बरगद के नीचे
डूबते सूरज से लाल होती नदी के किनारे
एक उठान पर
गिरा पड़ा रहा हूँ मैं
कई-कई शाम
सवाल चारो तरफ बच्चों सा खेलते रहे हैं
या बिलखते रहे हैं भूंख से
नंग-धडंग
रंग-बिरंग
अंग-भंग सवाल

चेहरों की झुर्रियों
पेशानी की सिलवटों
जुबान की अकुलाहटों
और जिन्दगी की झंझटों में
गुथे हुए
भिधे हुए
ठने हुए
तने हुए
सिमटे हुए
लिपटे हुए..सवाल
जवाब मांगते हैं
सख्ती के साथ

किस तरफ हूँ मैं?
तनी संगीनों की तरफ
या उन हांथों की तरफ
जिन्होंने संगीनों के जवाब में
पत्थर उठाए हैं
संगीनों की तरफ
कानून है, तंत्र है
पत्थर वाले हांथों की तरफ
लोक है, लोकतंत्र है
छटपटाहट है
अकुलाहट है
ज़माने के  बदलने की आहट है
किस ओर हूँ मैं ?


मेरा तिरंगा कौन सा है?
संसद, लाल किले
जिंदल,अम्बानी,टाटा-बाटा,बिरला
के महलों पर लहराता
अपहरण किये गए तीन रंगों का तिरंगा
या... भूंखी नंगी काया के हांथों में
उम्मीद के तीन रंगों वाला
रिक्शे,टैक्सी, ठेलों वाला
खेतों खलियानों वाला
लहराता आजाद तिरंगा
मेरा तिरंगा कौन सा है?


मेरा देश कौन सा है?
कंकरीट के ऊंचे-ऊंचे जंगलों में
भावनाओं को ठगता
सुबह से शाम तक
बदहवास भागता
अपनी ही परछाईं से डरता
रोटियां छीन कर बोटियाँ चबाता
इंडिया...
या..जल,जमीन,जंगल में मुस्काता
जिन्दगी में लिपटा
भावनाओं से  सना
आशाओं,इच्छाओं,उम्मीदों
और सामर्थ से बना
खून,पसीना, आँसू बहाता
हिन्दुस्तान....
मेरा देश कौन सा हैं?


किस ओर हूँ मैं?
मेरा तिरंगा कौन सा है?
मेरा देश कौन सा हैं?

सवाल जवाब मांगते हैं
सख्ती के साथ

एक कदम चलना भी
मुस्किल हैं साथी
एक कदम, सौ चौराहों में बदल जाता है
सौ चौराहे, चार सौ राहों में
चार सौ राहें, चार हज़ार सवालों में
चार हज़ार सवाल
चालीस हज़ार संभावित जवाबों की
अवैध संतानें पैदा करतीं हैं
इन जवाबों में
मेरा जवाब एक भी नहीं है
जिसकी नसों में
मेरा खून दौड़ता हो
ऐसा जवाब एक भी नहीं है
सारे के सारे
अवैध हैं
नाजायज हैं

हार कर अब नहीं जाता
उस जर्जर किले के पीछे
डूबते सूरज से लाल होती नदी के किनारे
उठान पर गिरने, शाम को

मैं सवालों से भाग रहा हूँ

किस ओर हूँ मैं?
मेरा तिरंगा कौन सा है?
मेरा देश कौन सा हैं?

मैं सवालों से भाग रहा हूँ
शायद इसीलिए भीतर से मर रहा है?

जीने के लिए सवाल जरूरी है...

तुम्हारा-- अनंत 

रविवार, फ़रवरी 12, 2012

उभरा हुआ चेहरा...........मुक्तिबोध की याद में

उभरा हुआ चेहरा........
किसी लम्बी कविता की तरह
नंगे पाँव
अँधेरे में
भटकते और बडबडाते हुए
पहाड़ी के उस पार
झील के नीचे
दिवार पर
फूले हुए पलिस्तर पर
झरे हुए रंग से
उभरा हुआ चेहरा
कुछ कहता है
कहता है
पार्टनर तुम्हारी क्या पॉलटिक्स है?
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया?
अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे !
ये खूनी सफेदी के जंगल जलाने पड़ेंगे
(चुप्पी,दब्बूपन,और मौत का रंग  सफ़ेद होता है )  
ब्रम्ह राक्षस की तरह बावड़ी में कैद मत रहो !
बहार निकलो !
मुँह खोलो !
कुछ कहो !

एक बुझी हुई बीड़ी जलाता हूँ फिर से
 धुंए में उड़ जाता है
वो चेहरा
बच जाती है
 वो बुझी  हुई बीड़ी
बुझा हुआ मैं
और बुझी हुई राख

तीनो में से किसी को भी
पढ़ लो !
गढ़ लो !
मढ़ लो !
तीनों के  तीनों
कविता है  

तुम्हारा--अनंत 

  

उम्र के अठारह बसंत पार करके........पा लिया था...........खुद-ब-खुद,

सब कहते है
मेरे पास कुछ है
जो उम्र के अठारह बसंत पार करके
उम्र के अठारह बसंत पार करके....
मैंने पा लिया था
खुद-ब-खुद
बड़ी ताकतवर चीज है वो
संसद चलाती है
सरकार बनाती है
बड़े-बड़े सूरमा
हाँथ जोड़ते हैं
मेरे सामने
फैलाते हैं
अपना रेशमी दामन
कि मैं अपने खुरदुरे हांथों से
 दे दूं उन्हें वो चीज
जिसे मैंने पा लिया था
 उम्र के अठारह बसंत पार करके,
खुद-ब-खुद,

यकीन मानों
मुझे यकीन नहीं होता
कि मेरे पास कुछ है
 जिससे सरकार बनती है
संसद चलती है
सत्ता जिसके मुँह ताकती है
मेरे पास ऐसा कुछ है
किसकी कुछ कीमत है
यकीन मानो
मुझे यकीन नहीं होता
बल्कि हर बार ऐसा लगता है कि
आश्रित होने का झूठा भ्रम रचा जाता है
लोकतंत्र कि रीढ़ विहीन लाश का
 बचा हुआ खून चूसने के लिए
पाली बतालते हैं रक्त पिपासु
इसका भी इल्जाम आता है मेरे ऊपर
मैंने बदल दिया शोषित मृत शरीर पर
 शोषक की काया
नया शोषक नए तरीके से
नए जोश और रणनीति के साथ
चूसता है खून मेरा और मेरे लोकतंत्र का
हर बार मुझे लगा है
 कि मैं नपुंसक हूँ
 जो नहीं सम्भाल पाया
 वो कीमती चीज
जो पा लिया था
मैंने उम्र के अठारह बसंत पार करके
 खुद-ब-खुद
छीन लिया शोषक ने
 और कर रहे हैं शोषण लोकतंत्र की लाश का
बदल कर चाल -चेहरा
भाषा, रंग और झंडा
 खड़े हैं चारों तरफ बदले हुए
 बटे हुए
 बिखरे हुए
सब एक हैं
 छीन लेंगे इस बार भी मुझसे
 वो चीज जिसे मैंने पाया था
 उम्र के अठारह बसंत पार करके
 खुद-ब-खुद

तुम्हारा--अनंत  

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

मजूरा जानता है......

तनी भृकुटी पर
अनमने से मन की
बलि दे कर
फिर से लग गया था काम पर
हाड-मांस की काया है
मशीन नहीं है बाबू जी !..
ये भी नहीं कह सका
क्योंकि जवाब का जूता
खा चुका था कई बार 
तुम नहीं तो कोई और सही
बहुत हैं काम करने को
कामचोर! कहीं के......
कहा जोर से
 मालिक ने
 सुना दुनिया ने


 सुगबुगाते हुए
 अपने आक्रोश और चीख को
धैर्य और विवशता की
काली पहाड़ी के पार
 खूँटे से बाँध कर
 बुदबुदाया मजूरा !
 तुम जैसे ही हैं सभी
 बहुतों के यहाँ करा है काम
 दामचोर! कहीं के....
 कहा  अपने ही मन में
 सुना मजूर ने


 मजूर कामचोर है
दुनिया जानती है
 मालिक दामचोर है
 मजूरा जानता  है


(क्योंकि दुनिया मन की आवाज़ नहीं सुन सकती .....)
तुम्हारा--अनंत 

गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

उजाला दर्द है...... दर्द उजाला है

अँधेरे में ख़ामोशी ओढ़ बैठा उजाला,
कलम थाम कर कुछ लिख रहा है,
रगों के लहू और जिस्म के पसीने को,
कलम में भर  कर,
वो दिलों में बह रहा है,
गजलों के शेरों में उजाला पेवस्त है,
भूख चबाये दर्द पिए वो अलमस्त है,
चादर मजार पर पड़ी है उजाले की,
शहर की चौक पर उजाला घुट रहा है,

कमर पर लटके बच्चे के रोने की आवाज़,
माथे पर चुह्चुहाते लाल सिन्दूर की टपकन,
और पैर में पड़े पायल की आवाज़ ,
रचते है एक कोलाज,
जिसकी सूरत मिलती है द्रोपदी से,
शायद उजाला देखना  चाहता है,
महाभारत फिर से,
कर रक्खी  है बगावत उजाले ने,
वो बागी बना भटक रहा है,
जीते हैं सब हंसी में उजाला ग़मों का शौक़ीन  है,
ख़ामोशी की इस गहरी खाई में,
लिथड़ा पड़ा उजाला,
हर ग़मगीन आवाज़ में घुल कर बोल रहा है ,

उजाला दर्द है...... दर्द उजाला है    

तुम्हारा--अनंत

इंसान बारूद है........

इंसान फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,

ये बारूद चिंगारियों से नहीं दगता,
ज्वालामुखी के लावों से भी नहीं,
आग की सुनामी भी पचा जाता है ये,
ये बारूद जुल्म की इंतहाँ से फूट पड़ता है,
इंसान फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,

बारूद सीलन से ख़राब हो जाता है,
सीलन ख़ामोशी है,
चुप्पी है,
डर है,
दब्बूपन है,
मौन है,
सुरक्षा के लिए आकुलता है,

सीलन बढ़ रही है वतन में,
मुझे डर है,
कि कहीं वतन का सारा बारूद ख़राब न हो जाए,
और मैं फिर कभी  न कह पाऊँ कि......
 
इंसान  फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,
 
तुम्हारा --अनंत 

सोमवार, जनवरी 30, 2012

बडबडाहट......गाँधीजी की पुण्यतिथि पर मेरी दो कड़वी कविताएँ

कई बार आदमी  कुछ कहना चाहता है पर कुछ कह नहीं  पाता,ये कुछ न कह पाना उसे बहुत कुछ कहने के लिए मथ देता है,उस वक़्त उस आदमी  की स्तिथि त्रिसंकू की तरह होती है वो ''कुछ'' और ''बहुत कुछ'' के बीच ''कुछ नहीं'' को नकार कर खुद से  ''कुछ-कुछ'' कहने लगता है |ये ''कुछ-कुछ'' वो अपने दिल से कहता है| अक्सर ये खुद से कुछ-कुछ कहना ही सच्चा कहना होता है | क्योंकि आदमी सुबह से शाम तक जाने-अनजाने वो कहता-करता रहता है जो वो न कहना चाहता है न करना |  लोग खुद से कुछ-कुछ कहने को बडबडाना कहते है ...मैं इसे सच की आवाज़ कहता हूँ | जब कभी मैं भी सच कहने पर आता हूँ तो बडबडाता हूँ|
मैं अकेला नहीं हूँ जो बडबडा रहा हूँ, मुझसे पहले भी निराला,मुक्तिबोध,नागार्जुन,पाश,शमशेर,त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल जैसे अनेक लोग  बडबडाते हुए पाए गए है,जिन्होंने  कविता के बंध काट कर उसे बडबडाते हुए आज़ाद किया और साथ ले कर अभिव्यक्ति की कांटे भरे पथ पर चल निकले शान से........ मैं भी चलना चाहता हूँ उसी राजपथ पर जिस पर चल कर कांटो का हार मिलता है,मैं भी बडबडाना चाहता हूँ ,मैं  झूठ के अलावा भी कुछ कहना चाहता हूँ |

( 1 ) काश बापू तुम्हारा नाम ''गाँधी'' न होता

गाँधी जी से प्रेम है मुझे,
आदर की लहलहाती फसल जो बोई गयी है,
हमारी शिक्षा के द्वारा,
फसल की हर बाली,
चीख चीख कर कहती है,
''गाँधी जी'' राष्ट्रपिता हैं,
मैं भी कहता हूँ,
''गाँधी जी'' राष्ट्रपिता है,
क्योंकि मुझे भूखा नहीं रहना,
या यूं कि मैं भूखा नहीं रह सकता,
''गाँधी'' रोटी है ,
सूखी रोटी,

मगर ये भी सच है कि गाँधी जी का नाम सुनते ही,
मेरे मन में भर जाता है, एक लिजलिजा सा कुछ,
शायद  सांप या फिर अजगर,
सांप होगा तो डसेगा,
अजगर होगा तो लील लेगा,
गाँधी जी के नाम में गांधारी छिपी है,
जो अंधे ध्रतराष्ट्र की पट्टी खोलने के बजाये,
स्वयं अंधी पट्टी बंध लेती है,
ऑंखें  इच्छाएँ पैदा करती है,
ध्रतराष्ट्र अँधा था उसकी कोई इच्छा भी नहीं थी,
पर गांधारी की  आँखें भी थी और इच्छाएँ भी,
जो अंधी पट्टी के पीछे कोहराम मचाये रखती थी,
मुझे लगता है कि ''गाँधी'' गाँधी  न होते,
गर उनका नाम ''गाँधी'' न होता,
इस ''गाँधी'' नाम ने उन्हें,
गांधारी बना डाला,
और राष्ट्र को  ध्रतराष्ट्र,


(2) बापू तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर

बापू तुमने कभी हिंसा नहीं की,
 सब कहते है,
पढ़ते है,
जानते है,
सीखते है,
सब के सब झूठे हैं,
मुझे माफ़ करना बापू !
मैं ये सच कहूँगा,
कि तुमने  बहुतों को मारा है,
 मरवाया है,

विदर्भ  में हजारों किसानों ने फाँसी लगा ली,
क्योंकि तुम्हारी हरे पत्तों पर छपी,
मुस्कुराती तस्वीर नहीं थी उनके पास,

झारखंड में 5 साल का छोटू ,
कुतिया का दूध पी-पी कर,
 अपनी मरी हुई लाश पाल रहा है,
क्योंकि उसकी विधवा माँ के पास,
तुम्हारी मुस्कुराती हुई तस्वीर नहीं है,

तुम्हे मालूम है ?
कि तुम्हारी चंद मुस्कुराती हुई तस्वीर पाने के लिए,
रोज  तन बेचती है,
 देश की हजारों-हज़ार बच्चियां.....माएं,
क्या करें पेट भरने के लिए,
तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर जरूरी है,

बारह साल का कल्लू  जेल में बंद है,
कसूर रेल में पानी की  बोतल बेच रहा था,
घर में बीमार माँ-बाप और विकलाँग भाई की दवा करने के लिए,
तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीरों की जरूरत थी उसे,
पुलिस ने पकड़ा,
और तुम्हारी उतनी तस्वीरें मांगी,
 जितनी वो एक महीने में इकठ्ठा करता था,
नहीं दे पाया .....कल्लू  
तो तुम्हारी मुस्कुरती हुई तस्वीर के निचे बैठ कर,
 मजिसट्रेट ने 6 साल की सजा सुनाई दी उसे,
 और तुम हँस रहे थे,

तुम हत्यारे थे कि नहीं,
 मुझे नहीं मालूम,
पर तुम्हारी तस्वीर हत्यारी है,
तुम निष्ठुर-निर्दयी थे कि नहीं,
 मुझे नहीं मालूम,
पर तुम्हारी तस्वीर निष्ठुर और निर्दयी है,
तुम पक्षपाती थे कि नहीं,
 मुझे नहीं मालूम,
पर तुम्हारी तस्वीर पक्षपाती है,
तुम हिंसक थे की नहीं,
 मुझे नहीं मालूम,
 पर तुम्हारी तस्वीर हिंसक है,
तुम्हे पाने के लिए गरीब अंपने  तन से ले कर मन तक बेच देता है,
 पर तुम उसके हक के बराबर भी उसे नहीं मिलते,
 चले जाते हो,सत्ता के गलियारे  में ,
ऐस करने, या कैद होने,  
मुझे नहीं मालूम,

तुम्हारी हँसती हुई तस्वीर से चिढ है मुझे,
थाने से लेकर संसद तक जहाँ भी मेहनतकशों पर जुल्म ढाए जाते है,
तुम हँसते हुए पाए जाते हो,

 जब गरीब तुम्हारी कमी से,
 अपना मन कचोट रहा होता है,
तुम हँसते मिलते हो,
तुम्हारी कमी से,
 जब किसी गरीब को,
 उसके बौनेपन का एहसास होता है,
और जब इनसान होने का सारा वहम  टूट जाता है 
उसी पल तुम उसे मार देते हो,
मुझे भी तुमने इसी तरह कई बार मारा है ,

बापू मैंने सुना है कि,
तुम्हे गुस्सा नहीं आता, 
गुस्सा मत करना,
मुझे कुछ कहना है (तुम चाहो तो इसे मेरा बडबडाना भी कह सकते हो)

अगर तुम्हारी तस्वीर ऐसी है,
तो तुम कैसे होगे ????????.......
(ये क्या कह दिया मैंने ....हे राम !!!......................मृत्यु  )


गाँधीजी.......तुम्हारा-- अनन्त

शुक्रवार, जनवरी 27, 2012

मैं कहता हूँ,................कि मैं बांसुरी हूं,



उससे बिछड़ कर बाँसुरी हो गया हूँ,
दिल के हर ज़ख़्म,
सुराख है,
समाती है जब उसकी याद की खुशबु,
हर एक ज़ख़्म से उसका ही नाम टपकता है,
बड़ा मधुर है उसका नाम.........

न कोई धुन,न कोई ताल,
न कोई गीत,न कोई नज़्म,
न कोई आवाज़, न कोई  ज़ज्बा,
अब कुछ भी नहीं है,
बस वो है और उसकी याद है,
मैं हूँ और मेरे ज़ख़्म,
इनके अलावा गर कुछ बचा है,
तो वो है एक बांसुरी,
जिसमे अक्सर लोग मुझे,
खोजते हुए भटक जाते है..........

अकेले बजता रहता हूँ,
तन्हाई के पहाड़ पर,
चुपके से कलम बिन लेती है,
रंगीन बोल,
ढाल देती है,
उसे दर्द के सांचे में,
और तुम कहते हो,
कि ये कविता है,
नज्मों-ग़ज़ल है,
मैं कहता हूँ,
ये उसके नाम है,
तुम कहते हो,
 कि मैं शायर हूँ,
मैं कहता हूँ,
कि मैं बांसुरी हूं,

(तुम  मुझे नहीं समझ सकते क्योंकि तुम उससे नहीं मिले..................)

 तुम्हारा --अनंत