रविवार, अक्तूबर 27, 2013

ए! इकीसवीं सदी की कविता गवाही दो!

ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं
और तुम एक शब्द विहीन कविता हो!
तुम एक मौन की कविता हो!

तुम्हारी रगों में जो खून बह रहा है
वो बेवजह मारे गए लोगों का लहू है
और धडकनें उन आवाजों की कराह हैं
जिन्होंने बोलने के लिए जान गंवाई है

इस दोमुंहे समय में
जब डसा जाना बिलकुल तय है
तुम लड़ते हुए बीच में खड़ी हो

हे! तप्त मौन की शापित कविता
तुम जीवित हो!
मृत शब्दों और घुटी हुई आवाजों के साथ तुम
जीवित हो!
ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं

पिटे हुए विदूषकों और लफ्फाजों का दल
संविधान की छाती पर चढ कर राष्ट्रगान गा रहे हैं
राष्ट्रगान कि जिसमें राष्ट्र कहीं नहीं है
महज़ गान है
प्रेमिका की नाभि पर खिले हुए कमाल पर लिखा गान

कंक्रीट के जंगल में सपनों के पांव खो गए है
और हाँफते हुए हौसलों ने भटकना अपनी नियति मान ली है
नसों में बहता हुआ बहुरंगी बाज़ार तेजाब है
पर मजबूरी है कि तेजाब पी कर मरते हुए जीना है

एक देश दूसरे देश पर चढ़ा है
और दबे हुए देश की पीठ पर कानून अशोक की  लाट सा खड़ा है
हर चौराहे पर एक अंधी बनिया औरत है
जो अदालत की उस देवी से मिलती है
जिसने लक्षमनपुर-बाथे के अपराधियों को
आँखों पर पट्टी बांध कर बेक़सूर देखा था

सुनों!
वो देश जो जंगल में रहता है
खेतों में उगता है
नदियों में बहता है
लोहों में ढलता है
बचपन में मचलता है
और रोटी के ख्याल में भटकता हुआ
खुले आसमान के नीचे सोता है
तुम्हे गा रहा है
संविधान के चार दीवारी के उस पार
संसद के पहुँच से बहुत दूर
पेट की लड़ाई लड़ता हुआ
तुम्हे गा रहा है
भूख की ताल पर तुम्हे गा रहा है

ए! इकीसवीं सदी की कविता
अकेले पड़ते इंसान के अकेलेपन की गवाही दो!
ए! इकीसवीं सदी की कविता
मारी जाती इंसानियत की मौत की गवाही दो

ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं

गवाही दो!
कि अब कहने के लिए कुछ नहीं है
और करने को बहुत कुछ

तुम्हारा-अनंत

गुरुवार, अगस्त 01, 2013

मैं नज़्म हो गया हूँ शायद !

आज शाम शीशे में देखा, तो दिखा
मुझमे मैं नहीं, कोई और ही रह रहा है अब
कि जिसका नाम मेरे माजी* के किसी पन्ने पे लिखा
अपनी ही रूह तलाशता रहा है न जाने कब से 

न जाने कितनी बार क़त्ल किया है उसे 
न जाने कितनी बार साँसों में जलाया है 
रूह में दफनाया है उसे 
पर हर बार वो आशना* चेहरा 
उभर आया है मेरे चेहरे पर 

मैं हूँ, पर मुझमें मैं नहीं हूँ अब 
वो है, कि अब बस, वही वो है मुझमें 
तलाशता हूँ खुद को तो उसको पाता हूँ  
उसको ढूढता हूँ तो खुद तक पहुँच जाता हूँ 

मैंने रूह में दफ़न की थी जो कई नज्में 
साँसों की गर्मी में जलाया था जिन्हें 
सबने मिलकर मुझपे चढाई की है 

मैं एक किला हो गया हूँ हारा हुआ 
जहाँ नज्में, महज़ नज्में ही रहतीं हैं अब 
मैंने नज्मों को जो कभी मारा था 
सभी नज्मों नें मुझे मार डाला है 

अब मैं, मैं नहीं, नज़्म हो गया हूँ शायद 
बस इंतज़ार है 
कि कोई नज़्म आये और मुझे पढ़े नज्मों की तरह

तुम्हारा-अनंत 

*  माजी - इतिहास 
* आशना-परिचित    

बुधवार, जुलाई 31, 2013

अनगिनत आवाजों के घेरे....

पैरों पर पर्वत बाँध कर, भाग रहा हूँ मैं
साँसों की सड़क पर
और धडकनें भूल गयी हैं रास्ता
सपनों की गली में भटकते भटकते

नींद लेटी है रात के बगल में
दोनों जाग रहे हैं चुपचाप
और चाँद सो गया है
भूखे पेट, पानी पी कर

तारे हाँफते रहते हैं आजकल
और जब उन्हें देखो
तो धमकी देते हैं कि
वो अपनीं नसें काट लेंगे

मैं अपनीं आँखें बंद कर लेता हूँ
और अँधेरे से मोमबत्ती जलाने को कहता हूँ
पर अँधेरा कहता है कि उसके पांव कटे हैं
वो उठ नहीं सकता, चल नहीं सकता
वो बस पसरा रहेगा

जिंदगी के सारे सचों को मैं झूट बताता हूँ
और इसीबीच जिंदगी के सारे झूठ सच होते जाते हैं
मेरे पीछे जो लोग आ रहे हैं
वो मेरे क़दमों के निशान धोते जाते हैं

इस तरह मैं हर बार
अपने दर्द के साथ अकेला बचता हूँ
जैसे बच जातीं हैं,
कुछ सासें, सांस लेने के बाद
कुछ आंसू, बहुत रोने के बाद
कुछ बातें, सबकुछ कहने के बाद
और कुछ जिंदगी, मौत के बाद

तुम्हारे गुम्बद और किले से
जिंदगी खूबसूरत दिखती है
क्योंकि वहाँ से,
जागती नीदें
घायल रातें
भूखा चाँद
आत्महत्या करते तारे
हांफती हुई साँसे
कीचड़ में धंसी धड़कने
और भटके हुए सपने नहीं दीखते

तुम्हे वहाँ से लोगों के पैरों में बंधे हुए पर्वत
और अदृश्य आवाजों में उलझे हुए हाँथ नहीं दीखते

जहाँ मोम्बतियों की लवें
पैदा होते ही फांसी लगा लेतीं हैं
मैं वहाँ से आया हूँ

जहाँ सूरज पैदा होने से पहले मर जाता है
मैं उस जमीन पर खड़ा हूँ
जमीन के नीचे दबीं हैं मेरी ही  हड्डियां
और आकाश में तैर रही हैं मेरी लाशें

यहाँ मुझे अनगिनत आवाजें घेरे हुए हैं
जो मुझसे कह रही हैं
जिंदगी को ज़िदगी बनाना है
परिंदों को पंख लगाना है
इसलिए माफ करना
मैं तुम्हारी सपनीली दिवार पर लिखे नारे नहीं पढ़ सकता
मैं तुम्हारी तरह गुम्बद या किले पर नहीं चढ सकता

जहाँ से जिंदगी बहुत खूबसूरत दिखती है

तुम्हारा-अनंत   

शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

एक दिन न्यूटन का नियम सच होगा..

अंगडाई के आँगन में
जब तुमने नींद के कपड़े उतारे थे 
उसी वक्त सूरज ने चुराई थी 
तुमसे कुछ रौशनी 
और तुमने मुस्कुरा कर कहा था 
सुबह हो गयी!

तुम्हारी पायल ने कोयल को बोलना सिखाया था 
और होठों की लाली ने गुलाब को खिलना
तुम्हारी चाल से चलना सीखा था नदी ने 
तुम्हारी आँखों से देखा था आसमान ने धरती को 
पेड़ों पर तुम्हारी हंसी का नशा फल बन कर लदा था
और तुम इन सब से बेखबर 
कक्षा 9 की किताब में
"न्यूटन का तीसरा नियम'' पढ़ रही थी 

प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है

दरवाज़ा खुला था उसी समय 
और हुई थी तुम पर एक क्रिया 
जिसमे तुम्हारे नींद के कपड़े फाड़े गए 
तुम्हारी रौशनी को अँधेरा पहनाया गया 
और मुस्कान पर एक लिजलिजा ला चुम्बन चिपका दिया गया 
तुम्हारे भीतर बसी प्रकृति महज़ शरीर भर हो कर रह गयी थी 
जिसे छील कर फेंक दिया गया था, एक कोने में
खून से लथपथ एक सच पड़ा था, अधमरा सा
शायद वो तुम थी!   

तुम उस क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं कर सकी 
और धुआँ हो गयी थी 
जबकि मैं तुम्हे आग लिखना चाहता था 

अखबारों के तीसरे पन्ने में 
छोटे से कोने में 
चंद पंक्तियों में छपा था तुम्हारा उपन्यास 
जिसे पढ़ा था तुम्हारे लाचार भाई और बाप ने
सरकारी अस्पताल में मुर्दाघर के बहार  
और भरी थी किसी को सुनाई न देने वाली एक मुर्दा आह! 

न्यूटन का नियम झूठा है 
तुमने आखरी बार यही सोचा होगा 
जब हथेलियों की रेखाओं पर झूली होगी तुम 

या फिर इस विश्वास के साथ 
आँखों के पानी में डूब मरी होगी तुम 
कि एक दिन न्यूटन का नियम सच होगा
और प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होगी 


तुम्हारा-अनंत 


बुधवार, जुलाई 24, 2013

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ

एक प्यास का जंगल है
जो पानी के रेगिस्तान पर उग आया है 
फिदाइन मन गुजर रहा है 
ठहरे हुए समय की तरह 

एक रास्ता है 
जो माँ के दुलार से बम की आवाज़ तक फैला हुआ है 
एक और रास्ता है 
जो खुद शुरू हो कर खुद पर खतम हो जाता है  

मैं फलीस्तीन के किसी बच्चे की तरह 
सपनों की अलमारी में 
खिलौने और गुब्बारे रख कर आता हूँ 
पर न जाने वो कैसे 
बन्दूक, बारूद और धुआँ हो जाते हैं 

मुझे अफ़सोस होता है 
जब मुझे मालूम पड़ता है 
कि चेतना भिखारी की जूठन 
वैश्या की नींद 
मुर्दे के शरीर से उतरा हुआ कपड़ा हो चुकी है 
और अब लोगों को उसके नाम से उलटी आती है 

सब डरा हुआ चेहरा लिए हँस रहे है 
उड़ते हुए जहाज़ को देख कर 
भाप हुए जा रहे है

और मैं खून की नदी में 
अपने बाप की लाश पर तैर रहा हूँ 
माँ की चीखों के साज़ पर 
भाई बहनों के आंसूं के गीत गा रहा हूँ 
मुझे साफ़ दिखाई दे रही है 
लाशों के पहाड़ के उस पार 
मेरी वो ज़मीन 
जहाँ मैं बोऊंगा 
अपने बाप के सपने 
आपनी माँ की चीखें 
भाई बहनों के आंसूओं के बीज
और काटूँगा आज़ादी की फसल 

तब सारे प्यास के पेड़ गिरा दिए जायेंगे 
पानी के रेगिस्तानों को जला दिया जायेगा 
और बमों की आवाज़ के मुंह पर 
एक ढीठ बच्चे की हंसी लिख दी जायेगी 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब कैदी परिंदों के पंख तलवार हो जायेंगे 
और परवाज़ क़यामत 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब बच्चों के सपनों की अलमारी में 
बन्दूक, बारूद और धुएं की जगह 
खिलौने और गुबारे होंगे 
जब उनकी नींद में 
तेज़ाब नहीं बरसेगा 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब आजादी लिखने-पढ़ने की चीज़ नहीं 
बल्कि जीने और महसूस करने की चीज़ होगी 

तुम्हारा-अनंत
   

बुधवार, मार्च 20, 2013

एक नंगे आदमी की डायरी...

कागज पर कुछ लिख कर मिटा देना
नाजायज़ संतानें पैदा करके मार देने जैसा होता है
और लिखे हुए को काट देना
अपने बच्चों का गला घोंट देने जैसा कुछ

मैं ये बात  जानता हूँ
और इसे मैंने डायरी के आखरी पन्ने पर लिख दिया है
डायरी के बाकि पन्नों पर भी
मैंने यही लिखा है
कि मैं हत्यारा हूँ
और तुम भी
और वो भी जिसे हम तुम जानते है
या नहीं भी जानते
हर कोई एक हत्यारा है

हर कोई एक चलता-फिरता कब्रिस्तान है
जिसमे न जाने कितनी
नाजायज़ संताने दफ़न हैं

हर कोई एक जिन्दा मकतल है
जिसमे न जाने कितने
बच्चे मारे गए हैं
जिनके दिमाग में खिलौने
मुंह पर पहाड़ा
और हांथों में बिना नोक वाली पेन्सिल थी
(आँखों की बात मैं नहीं करूँगा. मुझे बच्चों की आँखों से डर लगता है)

जब हम नाजायज़ संताने पैदा कर रहे होतें हैं
बच्चों को मार रहे होते हैं
या डायरी लिख रहे होते है
तब हम बिलकुल नंगे होते है
बिलकुल!

कटी हुई पतंगों के पीछे
हवाएं रोते हुए भाग रहीं हैं
और अपने पीछे कदमो के निशान की जगह छोड़े जा रहीं हैं
टूटी हुई चूडियाँ
ढहे हुए घर
बिकी हुई दुकानें
खून के सूखे पपडे
गुर्राती हुई भूख
फटे हुए कपड़े
टकटकी बांधे हुई आँखें
सबकुछ पिघला देने वाली सर्दी
और सबकुछ जमा देने वाली गर्मी

हवाएं अपने ही क़दमों तले रौंदी जा रही हैं
वो रोते रोते मर रहीं हैं
और मरते-मरते रो रहीं हैं

बिन हवाओं के जीना कितना सुखद होगा न !
धडकनों और साँसों की जेल से बाहर
हरे मैदान में टहलने जैसा

बेहद कमज़ोर कविता के बेहद मज़बूत हिस्से में
मैं तुमसे बता रहा हूँ
कि तुम्हारे भीतर खून की जगह
गहरे काले राज़ बह रहे हैं
और मेरे भीतर एक ख़ामोशी है
जो लगातार बोल रही है
कोई उसे चुप क्यों नहीं करता!!

एक जंगल है जहाँ आवाजों के बड़े-बड़े पेड़ हैं
और सन्नाटों के लंबे-लंबे रास्ते
मैं अकेला हूँ तुम्हारे साथ
और तुम अकेले हो मेरे साथ

इसलिए सुनो!
तुम चले जाओ
मुझे खुद से बातें करनी है
मुझे हत्याएं करनी हैं
नंगा होना है
बिलकुल नंगा
मुझे डायरी लिखनी  है
नाजायज़ संतानें पैदा करनी हैं
और उन्हें मारना है

जाओ तुम चले जाओ
मुझे साँसों के फंदों पर लटकना है
एकांत का ज़हर पीना है
और कुछ लिखते-लिखते मर जाना है

तुम्हारा--अनंत  

मंगलवार, मार्च 19, 2013

खून में कांच बह रहा है.....

दुनिया जब दिल की बात करती है
उस वक्त मुझे सिर्फ सन्नाटा सुनाई देता है
और मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
चुप रहने की फ़िराक में कुछ कह पड़ता  हूँ
पर क्या ?
पता नहीं
शायद अपना आधा नाम
और तुम्हारा पूरा पता

हर शाम काँच से सारे शब्द टूट जाते है
और मैं उन्हें खून के घूँट के साथ पी जाता हूँ
दूर रेडियो पर कोई प्यार का गीत बज रहा होता है
और मैं कुछ याद करने की कोशिश में सब कुछ भूल जाता हूँ

एक बात तुम्हे बताता हूँ, तुम सबको बता देना
मेरी आत्मा तक सबकुछ छिल जाता है
जब प्यार जैसा कोई शब्द मेरे भीतर जाता है
मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
जैसे मानो मेरे भीतर बहता हुआ लहू
किसी का किया कोई बेहद भद्दा मज़ाक हो

जो हवा मेरे आस-पास है
वो मुझसे धीरे से कहती है
कि मेरा दिल एक बंद बक्सा है
जिसमें कुछ नहीं है
सिवाय एक ज़ख़्मी सूरज
और बहुत सारे अँधेरे के

यादों की परछाइयाँ भी हैं वहाँ
पर उनका होना
न होने को ज्यादा प्रभावित नहीं करता

वहाँ कोई आदमी नहीं हैं
पर आदमियों के नामों की आहटें हैं
जो रह रह कर धड़कतीं हैं
मेरे सीने की धडकनों की लय पर

आईने में कुछ साफ़ नहीं दीखता
मैं हूँ या तुम
या फिर कोई तीसरा
जिसकी शक्ल हम दोनों से मिलती है

आईना मुझे तोड़ देता है
और मैं बिखर जाता हूँ
जैसे किसी ने बेर खा कर
गिठलियां बिखेर दीं हों फर्श पर
हर गिठली में मैं हूँ
और मेरा दर्द है
जिसके सिरहाने बैठ कर रात, रात भर रुदाली गाती है
और मैं उसे देखता रहता हूँ
जैसे कोई बच्चा इन्द्रधनुष देखता है

दिल की दिवार पर एक बरगद उग आया है
जिसकी जड़ें तुम्हारी आँखों में समाईं हैं
तुम जब आँखे बंद करती हो
बरगद की शाख पर टंगी
मेरी तस्वीर का दम घुटने लगता है

दुनिया और तुम
दो परस्पर दूर जाते हुए बिंदु हो
और मैं
दुनिया और तुम्हारे बीच खिचता हुआ बिजली का तार
मैं ठहरा खड़ा हूँ
और मेरे भीतर से बिजलियाँ दौड रहीं हैं
मेरे आँखों में अँधेरा भरा हुआ है
और खून में कांच के टुकड़े बह रहे हैं

मैं किसी ज़ख़्मी कविता की तरह हो गया हूँ
और प्यास में लिथड़ा हुआ
खुद से कहीं दूर पड़ा हूँ

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, मार्च 11, 2013

मन की मौत का मातम....

मैं एक रुकी हुई घड़ी के नीचे
अधखुली खिडकी पर खड़ा हूँ
बाहर सिर्फ धुआं और सपने हैं

मेरे दिमाग में आग का दरिया बह रहा है
और मन आपरेशन थियेटर हो गया है
जहाँ तितलियाँ घुस आयीं है
सारे रोगी फूल बने बैठे हैं
और डाक्टर बच्चों की तरह खेल रहें हैं

मेरा आधा हिस्सा शायर हो गया है
और आधा हिस्सा कायर है
मेरे भीतर शायर और कायर जब खींचातानी करते हैं
उस वक्त मुझे
एक पुराना कमरा दिखाई पड़ता है
जहाँ एक फूटी ऐनक फर्स पर पड़ी है
और एक हांफती हुई औरत है
जो खूबसूरत है पर लगती नहीं

वो कुहरे से बनी एक लड़की को समझा रही है कि
दुनियां रुई का फाहा
कबूतर का पंख
और साबुन का बुलबुला नहीं है
उसे एक सेकेण्ड में एक हज़ार सपने नहीं देखने चाहिए
उसे खुद को राजकुमारी
और खूबसूरत लड़कों को राजकुमार नहीं मानना चाहिए

वो लड़की कुछ नहीं मानती
और अँधेरा सबकुछ डूबा ले जाता है
और मैं पसीने में भीग जाता हूँ

पसीने का दलदल बन जाता है
जिसमे एक लड़का फंसा हुआ है
और उसके पास बैठा एक अधेड़ गांजा पी रहा है
जब लड़का फूट कर रोता है
तो वो अधेड़ फूट कर हँसता है
ये फूट कर रोना और फूट कर हंसना
मुझे तोड़ देना चाहता है

मुझे ब्रहमांड से गलियां पड़तीं हैं
मेरे शरीर से दुनिया की सबसे खराब गंध आती है
और मैं चुल्लू भर आंसू में डूब कर मर जाना चाहता हूँ

मैं दौड कर दराज़ खोलता हूँ
जहाँ चाकू के ऊपर रामायण रखी है
मैं रामायण निकाल कर बिना माथे लगाए
न जाने कहाँ फेंक देता हूँ
और ग़ालिब के दीवान से दो शेर पढ़कर
उन्हें भाप बना देता हूँ

अब तक मैं पागल हो चुका होता हूँ
दुनिया का रंग काला पड़ चुका होता है
सारे रंगों को फांसी हो गयी होती है
लोहा साँसों में बहने लगता है
और धड़कने जंजीरों से जकड जातीं हैं

मैं पाश और धूमिल को बगल में दबाकर
गोदार्द का सिनेमा देखने लगता हूँ
मुझे जाने-पहचाने चेहरों वाले अजीब लोग घेर लेते हैं

मेरे भीतर का शायर
कविता लिखने लगता है
आग लगाने लगता है
फिल्मे बनाने लगता है
चीखने-चिल्लाने लगता है
दुनिया हाथों से पलटने लगता है
और सब कुछ बदलने न जाने कहाँ चला जाता है

मेरे भीतर का कायर सबकुछ चुपचाप देखता रहता है
और रुकी हुई घड़ी के नीचे वाली
अधखुली खिडकी से कूद कर जान दे देता है

मैं वहीँ पड़ा रह जाता हूँ
जैसे जान निकलने के बाद
एक लाश पड़ी रहती है


तुम्हारा--अनंत

सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

समय की मौत पर मुर्दे राष्ट्रगान गा रहे हैं..

समय ने जिस समय मुझसे कहा कि
उसे किसी भी समय
गोली मारी जा सकती है
या फांसी पर चढ़ाया जा सकता है

उस समय मैं रो रहा था
नारे लगा रहा था
या मिठाइयाँ बाँट रहा था
मुझे ठीक से याद नहीं !
पर मेरे कदम जमीन पर जमे थे
और जमीन के भीतर
कदम ताल तेज हो गयी थी

कुछ लोग बाहर निकलने वाले थे
जिन्हें गोली मारी जानी थी
या फांसी पर चढ़ाया जाना था
इनका चेहरा किसी देश के नक़्शे की तरह था
और इनका नाम किसी देश के नाम की तरह
इन्हें न गिना गया था
और न गिना जा सकता था

दांतों पर भाषा के तार कस दिए गए थे
और आँखों में पैनी शर्म भोंप दी गयी थी
गिलास में खून था या तेज़ाब पता नहीं
पर उसे पीना, जीने के लिए शर्त हो गयी थी
हर सांस पर एक घूँट लगानी थी और कहना था
भारत माता की जय!!

पर जब सांस लेने का मन भी न कर रहा हो
तब कोई भारत माता की जय!
कैसे कह सकता है
और वो हैं कि कहते हैं
राष्ट्रगान गाओ
देश के दुश्मन मारे जा रहें हैं
नाचो गाओ
खुशी मनाओ

फिर खेत की बालियाँ
घाटियों की बर्फ
रेगिस्तान की धूल
और समुद्र का पानी
अपनी ख़ामोशी को मार कर पूछतें हैं कि
राष्ट्र क्या है ?

जिसके नाम पर तुम कहते हो कि
रोने की जगह हंसना है
और जाते हुए लोगों को देख कर हाँथ नहीं हिलाना है
सच कहने का दिल करे तो जीभ काट लेना है
या फिर जंगलों में चले जाना है
और तुम्हारी गोलियों और फांसियों इंतज़ार करना है

और इस तरह जब तुम गा रहे होगे
"मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा"
उस वक्त चुप रहने या कुछ न कहने पर
तुम राष्ट्रद्रोह समझोगे
मैं जानता हूँ!

और मैं ये भी जानता हूँ
कि दंतेवाडा से लेकर जंतर मंतर तक
समय की शक्ल में, मैं ही मारा जाऊंगा
और तुम गाओगे
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..

उस वक्त मेरा मन कर रहा होगा कि
मैं शोक गीत सुनूं
मौन सुनूं
या फिर नारों की आवाज़ हो
भीड़ की कदम ताल हो
ज़मीन फोड कर निकले
लोगों की ललकार हो

पर उस वक्त गया जायेगा
राष्ट्रगान!!
और सबको बना दिया जायेगा बुत
हाँथ बंधे होंगे
आँखे बंद होंगी
और सांस इतनी धीमी होगी कि
वो महसूस भी न की जा सकेंगी

और उसी समय जब
सब मरे हुए लोगों की शक्ल समय से मिलने लगेगी
गोलियाँ बरसायीं जाएँगी
या सबको फांसी पर चढा दिया जायेगा
और कहा जायेगा कि
देश के दुश्मन मारे जा रहे हैं
खुशी मनाओ
नाचो गाओ

तुम्हारा अनंत

रविवार, जनवरी 27, 2013

मैं तुमसे मिलने नहीं आता...

आधी रात के उस पार
जहाँ शोर का झरना
चुप-चाप बहता है
और एकांत के वृक्ष
लगातार बोलते रहते हैं
वहीँ तुम रोज मेरा इंतज़ार करती हो
मैं जानता हूँ

पर मैं नहीं आऊंगा
क्योंकि तुम कहोगी कि
तुम्हारी हथेलियाँ रेत की बनी हैं
और आँखें ठहरा हुआ पानी हैं
इसलिए तुम मेरी चुकती हुई नब्ज़
और पिघलता हुआ वजूद
महसूस नहीं सकती

ये कहते हुए
जब तुम हँसोगी
सच कहता हूँ मेरा मन करेगा
कि  तुम्हारी हथेलियों की झरती रेत में दब कर मर जाऊं
या फिर तुम्हारी आँखों के ठहरे हुए पानी में डूब जाऊं

पर मैं जीना चाहता हूँ
अपने शब्दों को पक्षी
कविता को आकाश
दर्द को धरती
और खुद को तुम बनाना चाहता हूँ

इसीलिए आधी रात के उस पार
जहाँ शोर का झरना
चुपचाप बहता है
और एकांत के वृक्ष
लगातार बोलते रहते है
मैं तुमसे मिलने नहीं आता

तुम्हारा--अनंत

मंगलवार, जनवरी 01, 2013

मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!!

मेरी माँ लोरी सुनाते वक्त 
रोटी खिलाते वक्त 
मेरे कपड़े पछीटते वक्त 
और मुझे पीटते वक्त 
चाहती है कि मैं कपास बन जाऊं 
मुझे दीपक की बाती बनना है 
और कुल को उजाला करना है 

कुल एक अँधेरा कमरा है 
जहाँ कितने भी दीपक जला दो 
अँधेरा बना ही रहता है
और बनी रहती है
इस कमरे को रोशन करने की फ़िकर
जो मुसलसल रेंगती चली जाती है
एक पीढ़ी से अंतिम पीढ़ी तक

मैं कैसे समझाऊं कि ये वक्त
माचिस की तीलियों का वक्त है
लोहे का वक्त है
दलदल और चौराहों का वक्त है
कपास जीते जी मार दिया जायेगा
या मारते-मारते जिलाया जायेगा
इसलिए मेरे भीतर का कपास
माचिस की तीली या लोहा बन जाना चाहिए
ये उतना ही जरूरी है
जितना कोई भी गैरजरूरी काम जरूरी होता है

वो मुझमें दिल्ली देखना चाहती है
पर मुझमे दंतेवाडा, झारखण्ड और देश भर के जंगल उग आये है
वो चाहती है कि मैं सागर बन जाऊं
और सारी नदियों की नियति हो जाऊं
पर मैं नदियों को विद्रोह सिखाने में लगा हुआ हूँ
वो चाहती है कि मैं जो चाहूँ वो मुझे मिल जाये
मैं चाहता हूँ जो चाह कर भी कुछ नहीं चाह पाता
उसका चाहा उसे मिल जाये

वो किसी राम भगवान से मनाती है
कि मुझे सद्बुद्धि दे
मैं एक लिजलिजे डर से भर जाता हूँ
और सपने में एक गर्भवती महिला को जंगलों में छोड़ने चला जाता हूँ
जब नीद तोड़ कर उठता हूँ
तो पाता हूँ कि मैं भगवान बन चुका हूँ
और मेरे कुल का कमरा उजाले से भर गया है
दीवारों पर मेरे नाम के नारे हैं
और लोगों के दिल में मेरे नाम का भ्रम

मैं माँ की आँखों में एक सुकून देखता हूँ
उसकी इच्छाओं, कुंठाओं, प्रेमों और पूर्वाग्रहों में लिथड़ा हुआ कपास मुस्कुराता है
जिसकी सकल मुझसे हूबहू मिलती है

यकीन मानिये मैं चीख उठता हूँ
मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!! 


तुम्हारा--अनंत