गुरुवार, मई 25, 2017

मैंने खुद को खोद कर देखा है..!!

मैंने खुद को खोद कर देखा है
बस तू ही तू मुझे मिली वहाँ
एक उजाला, एक अँधेरा
एक आग और एक धुआँ
मैंने खुद को खोद कर देखा है.....

बेहिस क़दमों से चल कर
मैं खुद से खुद तक पहुंचा हूँ
एक कदम मेरा यहाँ पड़ा
एक कदम मेरा पड़ा वहाँ
मैंने खुद को खोद कर देखा है.....

तू साँसों में हवा सी घुलती है
तू धड़कन का पहरन पहनती है
मेरी साँसों में एक गहरी प्यास महकती है
मेरी धड़कन में लहराता है एक कुआँ
मैंने खुद को खोद कर देखा है.....

तू मेरे लहू की लाली का रंग रंग
तू नब्ज़ के साज़ के संग संग
मैं जिसमे घुल के बहता हूँ
तू है मेरी वो खुशरंग हवा
मैंने खुद को खोद कर देखा है.....

तुम्हारा-अनंत

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